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हिन्दी ग्राम क्या हैं?

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हिन्दी ग्राम

हिन्दी ग्राम शब्द में ही सम्पूर्ण परिकल्पना समाहित है, एक ग्राम, जो राष्ट्र की सबसे छोटी इकाई होकर भी समग्र को समाहित कर संचालित होता है, उसी उद्देश्य को हिन्दी ग्राम में सहेजा जा रहा है। हिन्दी ग्राम का मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा को रोज़गारमूलक व व्यवसाय से जोड़ना है, क्योंकि विश्व की कोई भी भाषा जैसे अंग्रेज़ी, जापानी, चाईनीज़, फ़्रेंच आदि जब तक बाज़ार से नहीं जुड़ी, तब तक उसका विकास सीमित ही रहा है।

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हिन्दी की गरिमा का समेकित स्वर मातृभाषा उन्नयन संस्थान मातृभाषा उन्नयन संस्थान Home

भारत में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने और जनभाषा के रूप में सर्व स्वीकार्यता लाने के उद्देश्य से 10 जनवरी 2018 को मातृभाषा उन्नयन संस्थान का पंजीयन मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इन्दौर से हुआ। वैसे तो इस संस्थान की शुरुआत वर्ष 2016 में महज़ एक वेबसाइट मातृभाषा.कॉम से हुई, जिसका तब केवल एक उद्देश्य था कि हिन्दी के नवोदित व स्थापित रचनाकारों को मंच उपलब्ध करवाना, जहाँ उनका लेखन नि:शुल्क प्रकाशित हो और पाठकों की पहुँच में आए। माँ अहिल्या की नगरी व मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इन्दौर से युवा पत्रकार एवं सॉफ़्टवेयर इंजीनियर डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने मातृभाषा उन्नयन संस्थान की नींव रखी, जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लेकर हिन्दी भाषा के प्रचार के सशक्त आंदोलन के रूप में सामने आया। एक अन्तरताने (वेबसाइट) से शुरू हुई यात्रा ने लोगों को अपनी भाषा, अपनी हिन्दी में हस्ताक्षर करने का संकल्प दिलवाना आरम्भ किया। इस आंदोलन के संरक्षक डॉ. वेदप्रताप वैदिक जी, अहद प्रकाश जी, चौथा सप्तक में शामिल कवि राजकुमार कुंभज जी हैं। इस संस्थान का प्रथम उद्देश्य हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना है। 

2+

2 विश्व कीर्तिमान

11 लाख

हस्ताक्षर बदलवाने पर एक विश्व कीर्तिमान बना

10000

से अधिक पुस्तकालयों

15+

पुस्तकों का लेखन

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संस्था के बारे में
हिन्दी ग्राम : भाषा, बाज़ार और रोज़गार का सशक्त सेतु

भारत में हिन्दी बोलने, समझने और पढ़ने वालों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है, फिर भी विडंबना यह है कि हिन्दी को अब भी अक्सर केवल भावनाओं, साहित्य और औपचारिक आयोजनों की भाषा मान लिया जाता है। रोज़गार, व्यापार, तकनीक और उद्यमिता की भाषा के रूप में हिन्दी को वह प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी, जिसकी वह स्वाभाविक रूप से अधिकारी है। यही कारण है कि हिन्दी के भविष्य को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती है। परंतु चिंता का समाधान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस और व्यावहारिक प्रयासों से संभव है, क्योंकि हिंदी भावनाओं की ही नहीं वरन् संभावनाओं की भाषा है। इसी दृष्टिकोण के साथ 7 दिसंबर वर्ष 2017 को इंदौर के युवा हिन्दीसेवी डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने हिन्दीग्राम स्थापित किया।

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