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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भाषाई आन्दोलन से जुड़ने के लिए आप ईमेल hindigramweb@gmail.com कर सकते हैं। इसके अलावा 9893877455 | 8839243077 मोबाईल पर संपर्क कर सकते हैं।
संस्थान द्वारा राष्ट्रव्यापी हस्ताक्षर बदलो अभियान संचालित किया जा रहा हैं, जिसमें हमारा ध्येय रहा कि हस्ताक्षर हमारे जीवन की सबसे छोटी इकाई है, और यदि व्यक्ति अपनी स्वभाषा से प्रेम प्रदर्शित करना चाहता है, अथवा अपनी भाषा को अंगीकार करना चाहता है तो इस छोटे से परिवर्तन से शुरुआत हो सकती हैं। अपने हस्ताक्षर को स्वभाषा में करने से भाषा की मजबूती की दिशा में पहला पायदान व्यक्ति के द्वारा चढ़ा जाएगा। आपकी एक आदत बदलने से हमारी मातृभाषा हिन्दी, राष्ट्र भाषा के गौरव को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगी, क्योंकि इसके माध्यम से हिन्दीप्रेमियों की फौज तैयार होगी। और स्वभाषा से प्रेम भी प्रदर्शित होगा साथ ही स्वभाषा और हिन्दी को महत्व मिलेगा। ‘एक कदम इंडिया से भारत की ओर’ के अंतर्गत हस्ताक्षर बदलो अभियान में आपकी सहभागिता सुनिश्चित करेगी।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मुख्यतः कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर होने के साथ-साथ पत्रकार हैं। मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। देशभर में आप हिन्दी के विस्तार के लिए काम कर रहे हैं। अब तक दस से अधिक किताबें लिख चुके हैं।
अधिक जानकारी के लिए https://arpanjain.com/ वेबसाइट पर देख सकते है
एक संभ्रांत मित्र के परिवार में अनायास अर्पण जी का जाना हुआ। वहाँ उनकी 14-15 वर्षीय बालिका और उसकी माँ के बीच का एक संवाद, जिसमें बच्ची की अपनी दादी को लेकर शिकायत थी कि दादी साड़ी वगैरह पहनती हैं और हिन्दी बोलती हैं, जिससे उसकी सभी दोस्त उन्हें ग़रीब और अनपढ़ समझते हैं। उसके बाद बच्ची की माँ के द्वारा अपने पति से सासु को वृद्धाश्रम छोड़ने की चर्चा की गई और वे मित्र भी अपनी माँ को वृद्धाश्रम छोड़ने के लिए राज़ी हो गए। आगामी छह माह में ही वृद्धाश्रम में दादी जी का निधन हो गया। तब यह बात अर्पण को कचोट गई कि आख़िर हिन्दी जानना इतना बड़ा अपराध है, जिससे परिवार का विखण्डन हो जाए और हम वृद्धाश्रम वाली संस्कृति को अपनाकर अपने राष्ट्र को स्वाहा कर दें। इसी के बाद, हिन्दी बचाओ आंदोलन का उदय हुआ, जिसे आज जनमानस मातृभाषा उन्नयन संस्थान के नाम से जानते हैं।
यह सर्वविदित है कि भारत की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार भारत में हिन्दी बोलने, सुनने, लिखने और समझने वालों की जनसंख्या 57.7 प्रतिशत हैं। और हमारी माँग भी यही है कि जो सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा हो उसे राष्ट्र की संपर्क भाषा के रूप में सर्वमान्यता मिले और वही भाषा, भारत का वैश्विक रूप से प्रतिनिधित्व करें। इन मानकों पर केवल हिन्दी ही एकमात्र भाषा है जो भारत में सर्वव्याप्त हैं । इसीलिए हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा का मान मिलना चाहिए।
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