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कमलेश कुमार कमल

कमलेश कुमार कमल का जन्म 1 सितम्बर 1982 को माता आशा देवी व पिता श्री लंबोदर झा जी के यहाँ हुआ। पिता राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं और माता धर्मपरायण घरेलु महिला। वस्तुतः साहित्य का चस्का गीतांजलि पढ़ कर लगा नहीं तो पहला प्यार गणित ही रहा है ! 12 वीं तक की पढ़ाई जवाहर नवोदय विद्यालय पूर्णियाँ से विज्ञान विषयों के साथ की । आगे , गणित के गुर सुपर 30 के आनंद कुमार से सीखा (तब यह रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स था।) आज भले ही लोग मुझे ‘कमल की कलम’ नाम से जानते हैं पर कभी पूर्णियाँ ,बिहार में ‘कमल्स टीचिंग सेंटर’ नाम से इंजीनियरिंग के दो संस्थानों का संचालन करता था जिनके 100 से अधिक छात्र आज देश-विदेश में कुशल अभियंता हैं । लेकिन एक बार जब साहित्य की लगन लगी तो फिर भाषा और साहित्य का ही होकर रह गया और सच कहूँ तो व्याकरण को समझने-समझाने में मुझे गणित की पृष्ठभूमि से बड़ा लाभ हुआ ।
आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि: 15 वर्षों के लेखकीय जीवन में मेरे लिए यह मानसिक परितोष देने वाला क्षण है जब 500 से अधिक साहित्यकर्मी और हजारों सुधी पाठक हिंदी से जुड़े किसी प्रश्न के उत्तर या संशय के शोधन के लिए मुझ पर भरोसा करते हैं ।
“कमल की कलम” की आशातीत सफलता ने जहाँ इसे प्रमाणित किया है ,वहीं मेरी जिम्मेदारी को बढ़ा भी दिया है। आप सबको प्रणाम करता हूँ और विश्वास दिलाता हूँ कि पूरी कोशिश करूँगा कि भाषा और व्याकरण की दुरूहतम चीजों को सरलतम तरीके से आपके समक्ष प्रस्तुत करूँ ।
वर्तमान में आप मातृभाषा उन्नयन संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ हिंदी ग्राम में संयोजक, साहित्य संपादक -साहित्यकार कोश, सहायक संपादक-अंतरा शब्द शक्ति ,.प्रबंध संपादक : शब्द-अभिव्यक्ति पत्रिका, कमल की कलम’ ब्लॉग के लेखक व इन सबके अतिरिक्त, संप्रति 29 वीं वाहिनी, ITBP में उप सेनानी के पद पर कार्यरत हैं ।
आप परिश्रम की पराकाष्ठा में विश्वास करते है, आपके अनुसार स्वर्गीय राजेंद्र यादव जी ने एक दुनिया समानांतर की भूमिका में लिखा है , “प्रतिभा अपने विस्फोट से नहीं ,अपने नैरन्तर्य से अपने आप को प्रमाणित करती है।” – मैं इससे सहमत हूँ ।
इसके अतिरिक्त मेरे लिए तीन दिशानिर्देशक सिद्धांत हैं:
1. ‘व्यक्ति नहीं विचारधारा’
2.‘सतत विकास’ और
3. ‘कौन सही है -महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण है कि क्या सही है।’
आपकी सफलता का राज- मैं अपने आप को सफल नहीं मानता । जिस दिन हर हिंदुस्तानी की ज़ुबान पर हिंदी होगी, उस दिन मैं अपने आपको सफल मानूँगा। मुझे गर्व है कि श्री वेद प्रताप वैदिक और राज कुमार कुंभज जी सरीखे युगपुरुषों का मुझे आशीर्वाद मिल रहा है तथा डॉक्टर अर्पण जैन जैसे समर्पित हिंदीसेवी अहर्निश मेरे साथ हैं।
भविष्य के लिए योजना: ‘हस्ताक्षर बदलो अभियान’ तो बस शुरुआत है ; बदलना तो उस सोच को है जो हिंदी को अंग्रेजी से कमतर समझती है ।
संस्थान का उद्घोष है: “हिंदी के सम्मान में, हर भारतीय मैदान में।”
आपका समाज को कोई संदेश: सभी हिंदी प्रेमियों से मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि माँ हिंदी अपने अतुल्य गौरव को प्राप्त करे, इसके लिए हमें भी अपना योगदान देना चाहिए ।
हमारा किसी भाषा से कोई बैर नहीं है .. खुद मेरा ही एक अंग्रेजी उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य है । इसके अलावा संस्कृत भाषा का अल्प ज्ञान भी हिंदी शब्दों की व्युत्पत्ति को समझने-समझाने में सहायक प्रतीत होता है। लेकिन, इतना तय है कि हिंदी हम सबके जीवन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसलिए इसके प्रति हमारा दायित्व भी है । हर राष्ट्र की एक राष्ट्रभाषा होती है ,भारत की भी होनी चाहिए ।आखिर भारत देश भर नहीं ,एक राष्ट्र भी है । हिंदी हमारे हँसने, बोलने , दुःख- सुख, स्वप्न देखने की भाषा है , तो क्यों ना इसे रोजगारोन्मुख बनाया जाए ? इसका प्रयोग करने में क्यों न हम सबको गर्व की अनुभूति हो ?
जहाँ तक संस्थान के उत्तरदायित्व का प्रश्न है तो हम कोशिश करेंगे कि हिंदी से जुड़ी हर समस्या का समाधान लेकर समाज के सामने आएँ !